शनिवार, 21 मार्च 2009

२० मार्च, एक घोड़ा दो सवार

राई का पहाड़ जोर-शोर से तैयारी पर है। लेकिन मई में कौन सा नाटक खेला जाना है इसका निश्चय अभी तक नहीं हुआ है... आज की चौपाल विशेषरूप से यही तय करने के लिए थी। उसके बाद एक घोड़ा तीन सवार पढ़ा जाना था और उसके बाद राई का पहाड़ का रिहर्सल होना था। गोष्ठी का समय 10:30 का था। 10:40 तक प्रकाश, कौशिक, सबीहा, मैं, दारा, उमेश पहुँच चुके थे। थोड़ी देर में अली भाई भी आ गए। बिमान दा का इंतज़ार था पर उनका फ़ोन बज नहीं रहा था। बाद में पता चला उन्होंने नया फ़ोन लिया है। पाँच मिनट के अंदर मेनका, मिन्हास, मूफ़ी और रिज़वी साहब भी आ गए। ये लोग बैठे ही थे कि बिमान दा भी आ पहुँचे। बस शुरू हो गई चौपाल...

तो मई में हम क्या करने जा रहे हैं? हमारे पास फ़िलहाल दो स्क्रिप्ट्स ही हैं। 'एक घोड़ा तीन सवार' और 'खजूर में अटका'। यों तो 'साठे का क्या करें' किया जा सकता है और 'दस्तक' तो तैयार भी हैं। इनमें से कोई त्रासदी नहीं लेकिन ये गंभीर किस्म के नाटक हैं। स्पांसर को कामदी यानी कॉमेडी चाहिए। स्पांसर नहीं तो नाटक कैसे होगा? लेकिन कॉमेडी तो सभी करते हैं फिर हममें खास क्या है? चाहे 'बड़े भाई साहब' हो या 'बल्लभपुर की रूपकथा', 'संक्रमण' या 'दस्तक' या 'चौदह' या 'जलूस' हमने ऐसे नाटक किए है जो या साहित्य की चुनी हुई कृतियों पर आधारित हैं या उनमें कुछ ख़ास है। लेकिन कुछ खास करने के लिए पैसों की दिक्कत हमेशा बनी रहती है। फ़िलहाल तो हमें 'खजूर से अटका' और 'एक घोड़ा तीन सवार' में से ही एक का चयन करना होगा। और वह भी आज क्यों कि थियेटर की बुकिंग 28 मई की है। हमें कम से कम 40 रिहर्सल तो चाहिए ही चाहिए। 'खजूर से अटका' प्रकाश पहले कर चुके हैं तो उनके दिमाग में सबकुछ साफ़ सा है, लेकिन एक बड़ी समस्या है- इसके लिए विशेष सेट चाहिए। सेट की कीमत? अंदाज लगाया गया... लगभग दो ढाई हज़ार दिरहम से कम नहीं बैठेगी। फिर?

यह विचार विमर्श चल ही रहा था कि दुबई मेल आ गई। दुबई के लोग यानी रागिनी, शांति, अश्विन, मीर। साथ में रागिनी की छोटी बिटिया। अनेक बातों के बीच नाम पूछने का समय ही नहीं रहता। पिछली एक बार शान और नीरू का बेटा भी आया था वह भी बाहर लॉन पर अकेला खेलता रहा। लगता है कि दो चार बच्चे हमेशा आएँ तो सबको दोस्त मिल जाएँगे, पर आजकल तो बच्चे भी कितने व्यस्त से रहते हैं। हाँ एक नया चेहरा भी था- शेख।

राई का पहाड़ में मेनका, सबीहा, मूफ़ी, ज़ुल्फ़ी, मीर... पूरी टीम ठीक से याद नहीं आ रही। अगली बार सबके नाम सही सही याद कर के लिखूँगी, पात्रों के नाम भी और कलाकारों के नाम भी। फोटो दुबई मेल के आने से पहले खीचे गए थे सो दुबई के सब लोग रह गए। ऊपर के चित्र में बाएँ से शेख, रिज़वी साहब, मिन्हास बिमान दा, अली भाई, मूफ़ी, उमेश और दारा। नीचे के चित्र में बाएँ से दारा, मेनका, मैं, सबीहा, कौशिक, प्रकाश। फोटो प्रवीण जी की मेहरबानी से। तो...28 मई यानी एक घोड़ा दो में से किस सवार को मिला? 'खजूर से अटका' को या 'एक घोड़ा तीन सवार को'? यह मुझे पता नहीं चल सका क्यों कि किसी के यहाँ ज़रूरी जाना था और गोष्ठी के बीच से उठना पड़ा। खैर, अगली बार...

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