सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

२३ अक्तूबर, तैयारियाँ खिलजी के दाँत की

बहुत दिनों बाद इस सप्ताह चौपाल फिर से सहज मंदिर में लगी। सबीहा के निर्देशन में के. पी. सक्सेना के नाटक खिलजी के दाँत के मंचन का योजना बन रही है। कभी एक दो बार चौपाल न लगे तो अगली बार कम लोग आते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही था। प्रकाश के यहाँ मेहमान थे इसलिए वे अनुपस्थित रहे लेकिन डॉ. साहब और कौशिक भारत से लौट आए हैं तो चौपाल में उनकी उपस्थिति रही। मेनका और सबीहा भी आए, आमिर बहुत दिनों बाद दिखाई दिए। प्रवीण और मैं तो थे ही। बात विशेष रूप से खिलजी के दाँत के मंचन की संभावनाओं और कठिनाइयों के विषय में हुई। धन की व्यवस्था सबसे बड़ी समस्या रहती है। यह नाटक हास्य-व्यंग्य से भरपूर है और लगभग ४० मिनट का है तो दो नाटक समूहों को एक साथ मिलाकर दो नाटक करने की योजना पर भी बातचीत हुई। शायद इसे फरवरी में मंचित किया जाएगा। सबने मिलकर नाटक का पाठ भी किया। चित्र में बाएँ से- कौशिक, डॉ. उपाध्याय, आमिर, सबीहा और मेनका।

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