बहुत दिनों बाद इस सप्ताह चौपाल फिर से सहज मंदिर में लगी। सबीहा के निर्देशन में के. पी. सक्सेना के नाटक खिलजी के दाँत के मंचन का योजना बन रही है। कभी एक दो बार चौपाल न लगे तो अगली बार कम लोग आते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही था। प्रकाश के यहाँ मेहमान थे इसलिए वे अनुपस्थित रहे लेकिन डॉ. साहब और कौशिक भारत से लौट आए हैं तो चौपाल में उनकी उपस्थिति रही। मेनका और सबीहा भी आए, आमिर बहुत दिनों बाद दिखाई दिए। प्रवीण और मैं तो थे ही। बात विशेष रूप से खिलजी के दाँत के मंचन की संभावनाओं और कठिनाइयों के विषय में हुई। धन की व्यवस्था सबसे बड़ी समस्या रहती है। यह नाटक हास्य-व्यंग्य से भरपूर है और लगभग ४० मिनट का है तो दो नाटक समूहों को एक साथ मिलाकर दो नाटक करने की योजना पर भी बातचीत हुई। शायद इसे फरवरी में मंचित किया जाएगा। सबने मिलकर नाटक का पाठ भी किया। चित्र में बाएँ से- कौशिक, डॉ. उपाध्याय, आमिर, सबीहा और मेनका।
सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
२३ अक्तूबर, तैयारियाँ खिलजी के दाँत की
बहुत दिनों बाद इस सप्ताह चौपाल फिर से सहज मंदिर में लगी। सबीहा के निर्देशन में के. पी. सक्सेना के नाटक खिलजी के दाँत के मंचन का योजना बन रही है। कभी एक दो बार चौपाल न लगे तो अगली बार कम लोग आते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही था। प्रकाश के यहाँ मेहमान थे इसलिए वे अनुपस्थित रहे लेकिन डॉ. साहब और कौशिक भारत से लौट आए हैं तो चौपाल में उनकी उपस्थिति रही। मेनका और सबीहा भी आए, आमिर बहुत दिनों बाद दिखाई दिए। प्रवीण और मैं तो थे ही। बात विशेष रूप से खिलजी के दाँत के मंचन की संभावनाओं और कठिनाइयों के विषय में हुई। धन की व्यवस्था सबसे बड़ी समस्या रहती है। यह नाटक हास्य-व्यंग्य से भरपूर है और लगभग ४० मिनट का है तो दो नाटक समूहों को एक साथ मिलाकर दो नाटक करने की योजना पर भी बातचीत हुई। शायद इसे फरवरी में मंचित किया जाएगा। सबने मिलकर नाटक का पाठ भी किया। चित्र में बाएँ से- कौशिक, डॉ. उपाध्याय, आमिर, सबीहा और मेनका।
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
९ अक्तूबर, जमघट अली भाई के घर पर
शुक्रवार चौपाल इस बार अली भाई के घर पर लगी। सबीहा का फोन जिसमें निज़ाम का नंबर था दगा दे गया। इस लिए फोटो नहीं खिंची और निज़ाम से संपर्क न होने के कारण चौपाल सहज मंदिर में नहीं लग सकी, जहाँ वह हमेशा लगती है। प्रकाश अपना घर बदल रहे हैं अतः वे भी अनुपस्थित रहे। 3 अक्तूबर को मंचित लियो आर्ट्स के नाटक "जिस लाहौर..." के विषय में बात हुई और 'खिलजी के दाँत' नाटक पढ़ा गया। अली भाई के अतिरिक्त इस चौपाल में डॉ. उपाध्याय, और सबीहा उपस्थित थे। साढ़े ग्यारह तक मोहित और मेनका भी पहुँच गए। मोहित इस चौपाल के नये सदस्य हैं। दोपहर के लगभग एक बजे चौपाल समाप्त हुई।
रविवार, 4 अक्टूबर 2009
२ अक्तूबर, शहर से अनुपस्थित
इस बार मैं अपने शहर शारजाह से दूर सहारनपुर के एक गाँव में हूँ। खुशी की बात यह है कि इस गाँव में इंटरनेट है। ईमेल चेक करने के लिए इस कैफ़े में आई हूँ। प्रकाश का ईमेल आया है। इस बार की चौपालके विषय में वे लिखते हैं कि this friday we are not having chaupal as dr sab is in india, too. sabiha and others are involved in 'jis lahore nahi dekhya...aap bhi nahi hai.... vaise bhi gine chune log hi aate hai...to socha seedhe agle friday hi mile... लगता है चौपाल के पाठकों अब आगले सप्ताह की जानने को मिलेगा कि शारजाह के थियेटरवाला क्या कर रहे हैं। ठीक है तो फिर अगली बार ही मिलते हैं।
शनिवार, 26 सितंबर 2009
२५ सितंबर, साथियों की वापसी

ईद के बाद यह पहला शुक्रवार था। बहुत से लोगों के आने की उम्मीद थी लेकिन लगता है लोग अभी त्योहार के नशे से उबरे नहीं हैं। डॉ.उपाध्याय आज सबसे पहले पहुँचे। हालाँकि प्रकाश आमतौर पर सबसे पहले आते हैं लेकिन वे घर बदलने की वयस्तताओं में हैं, इस बार उनका आना संभव नहीं हुआ। सबीहा समय से आने वालों में हैं पर इस बार वे कुछ देर से आयीं। बहुत दिनों से गायब मूफ़ी को देखकर सबके चेहरे पर खुशी छा गई। थोड़ी ही देर में मेनका भी आ गयीं। बस अपनी चौकड़ी पूरी हो गई। तमाम दिनों से बंद बातों का डिब्बा खुल गया। अगली प्रस्तुति के विषय में तो बात हुई ही तमाम ऐसी बातें भी हुईं जो नाटक या चौपाल से संबंधित नहीं थीं। टीवी सीरियलों की बातें, नई फ़िल्मों की बातें और भी बहुत सी बातें। आज के कार्यक्रम में हमें अशोक लाल का नाटक आम आदमी... पढ़ना था लेकिन पात्र पूरे ने होने के कारण हमने गुलज़ार की कहानी धुआँ और भीष्म साहनी की कहानी चीफ़ की दावत पढ़ी। मेनका कभी चाय नहीं पीती हैं। सबीहा भी तबतक चाय पीना पसंद नहीं करतीं जबतक रिहर्सल की थकान न हो। चाय के लिए मना न करने वालों में आज सिर्फ दो लोग थे डॉ.उपाध्याय और मूफ़ी, यानि बहुमत में दम नहीं था। सबीहा ने बीच का रास्ता अपनाया और बोलीं के वे बिना दूध की चाय पी सकती हैं जिसे यहाँ की भाषा में सुलेमानी कहते हैं। फिर तो सभी सुलेमानी के लिए तैयार हो गए। चौपाल में आज पहली बार सुलेमानी की बहार रही। जिस सहज मंदिर में चौपाल लगती है वहाँ कुछ कुर्सियाँ भी रहती हैं। कुछ लोग हैं जो ज़मीन पर बैठकर ध्यान नहीं कर सकते। आज हम कुछ ही लोग थे तो कुर्सियों पर ही बैठ गए। चित्र में बाएँ से-डा.उपाध्याय, मूफ़ी, सबीहा और मेनका। फोटो प्रवीण सक्सेना ने ली है। बहुत दिनों से दुबई मेल नहीं आयी है। शायद वे अगली बार से चौपाल में शामिल होना शुरू करें। इस अगले सप्ताह से मैं तीन हफ़्ते की छुट्टी पर हूँ सबीहा ने वादा किया है कि वे चौपाल लिखना जारी रखेंगी। मूफ़ी का केटरिंग का व्यवसाय है। चाय उनके ज़िम्मे रहेगी। किसी कारण से वे न आ सके तो डॉ.उपाध्याय का सौजन्य तो है ही। कमरा खोलने और एसी चालू करने का काम निज़ाम करेगा। बस इसी बात पर हमने विदा ली।
शनिवार, 19 सितंबर 2009
१८ सितंबर, सफल सप्ताह
यह सप्ताह चौपाल के बहुत से सदस्यों के लिए असीमित व्यस्तताओं से भरा रहा। रमज़ान की चहल-पहल, नौकरी की भाग-दौड़ और इस सब के साथ इंडियन स्कूल में कहानी संक्रमण की प्रस्तुति के लिए डॉ. उपाध्याय,प्रकाश, सबीहा और कौशिक को काफ़ी भागदौड़ का सामना करना पड़ा। अंतिम समय पर कल्याण और संग्राम भी सहयोग के लिए आ मिले तो प्रदर्शन अच्छा रहा। सब खुश थे। दूतावास से कौंसलाधीश और सांस्कृतिक सचिव की उपस्थिति ने अभिनेताओं को खासा रोमांचित किया। साथ के चित्र में प्रदर्शन से पहले ग्रीनरूम से बाएँ से डॉ.उपाध्याय, प्रकाश, संग्राम, सबीहा, कल्याण और त्रिवेणी। कौशिक तब तक पहुँचा नहीं था, सुबह की भाग दौड़ वाली व्यस्त सड़कों पर ट्रैफ़िक के बीच से उसका फ़ोन ज़रूर आ गया था। अच्छा यह रहा कि नाटक से पहले कुछ और भी कार्यक्रम थे और वह समय से पहुँच गया। प्रस्तुति के कुछ चित्र डॉ.उपाध्याय ने पिकासा पर यहाँ रखे हैं, कुछ लोगों को रोचक लगेंगे।
इस शुक्रवार चौपाल में बंगलुरु के रंगकर्मी और साहित्यकार मथुरा कलौनी के आतिथ्य का अवसर मिला। वे पिछले कई सालों से हिंदी रंगमंच के विकास में महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे नाटक, कविता और कहानियाँ भी लिखते रहे हैं। अभिव्यक्ति में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। इस बार चौपाल में उनके हाल ही में मंचित नाटक खराशें की वीडियो रेकार्डिग देखाई गई। उनसे कविता सुनी और प्रकाश सोनी ने उनकी कहानी 'एक दो तीन' का पाठ किया। कहानी खासी रोचक थी और सबने इसका मज़ा लिया। बाद में सबने मिलकर खाना खाया। चौपाल में दो नाटकों की विशेष चर्चा रही। 'खराशें' और 'कब तक रहें कुँवारे'। दोनो ही नाटक मथुरा कलौनी जी के हैं। खराशें जहाँ राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं को लेकर बुना गया विचारोत्तेजक नाटक है वहीं कब तक रहें कुँवारे हास्य व्यंग्य से परिपूर्ण है। कब तक रहें कुँवारे की एक कव्वाली काफ़ी रोचक रही थी।
इस कव्वाली को यहाँ देखा जा सकता है। खराशें का एक दृश्य यहाँ देखा जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में हमने कलौनी जी को थियेटरवाला की ओर से प्रस्तुत कुछ नाटकों के सी.डी. भेंट किए। आज के कार्यक्रम में उपस्थित थे अतिथि साहित्यकार श्री मथुरा कलौनी, डॉ. शैलेश उपाध्याय, प्रकाश सोनी, सबीहा मजगाँवकर, कौशिक साहा, प्रवीण सक्सेना, दिलीप परांजपे, कल्याण चक्रवर्ती और त्रिवेणी शेट्टी।नवरात्र हैं और डाँडिया की धूम इमारात में भी खूब रहती है। इस अवसर पर सबके मनोरंजन के लिए हमारे सदस्य दिलीप परांजपे ने अजमान बीच होटल में डाँडिया का आयोजन किया है। यह आयोजन इसलिए भी विशेष है कि यह शतप्रतिशत असली डाँडिया है जिसमें डाँडिया नचवाने वाला एक पारंपरिक ग्रुप भारत से बुलाया गया है। यानी सिर्फ रेकार्ड नहीं बजेंगे। लाइव संगीत होगा। 23, 24, 25 और 26 की शाम 9 से 12 तीन घंटे लगातार चलने वाले इस धूमधाम भरे कार्यक्रम में भाग लेने वालों के लिए विस्तृत जानकारी साथ के पोस्टर को क्लिक कर के देखी जा सकती है।
शनिवार, 12 सितंबर 2009
११ सितंबर, तैयारियाँ हिंदी दिवस की

इस बार चौपाल का विशेष कार्यक्रम आगामी नाटक का रिहर्सल रहा। दरअसल यह नाटक नहीं है बल्कि कामतानाथ की कहानी संक्रमण का मंचन है। कहानी में कोई परिवर्तन या नाट्य रूपांतर नहीं किया गया है। ज़रूर मंचन की दृष्टि से मंच सज्जा की गई है और पत्रों को अभिनय और संचालन दिए गये है। प्रकाश और ध्वनि की व्यवस्था भी की गई है। यह मंचन हिंदी दिवस के अवसर पर इंडियन हाई स्कूल और भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में होना है। नाटक लगभग तैयार है। कुछ परिवर्तनों के साथ इसे प्रस्तुत किया जाना है। भूमिकाओं में भी परिवर्तन हुए हैं। सब कुछ मिलाकर रिहर्सल अच्छा रहा। सबको संवाद और मूवमेंट्स याद थे। पिता की भूमिका में हैं डॉ. शैलेष उपाध्याय, पुत्र की भूमिका में हैं कौशिक साहा और माँ की भूमिका सबीहा निभा रही हैं। निर्देशन प्रकाश सोनी का है। साथ के चित्र में वे सबीहा को कुछ समझाते हुए।
आज की चौपाल कुछ देर से शुरू हुई थी- प्रकाश और कौशिक की प्रतीक्षा में। प्रकाश बूँदी के लड्डू लाए थे। मन्नत मुंबई से शारजाह आ गई है, इसी खुशी में। कौशिक ने कहा सिर्फ मिठाई से काम नहीं चलेगा। तो इस बार चाय के साथ मिठाई और नमकीन भी रहे। ऐसे मौके रोज़ तो नहीं आते। सबीहा ने बताया बिमान दा भी दुबई लौट आए हैं। काफ़ी लोग अभी भी देश विदेश घूम रहे हैं। आज की चौपाल में थे डॉ. उपाध्याय, प्रकाश सोनी, कौशिक साहा, सबीहा मजगाँवकर और मैं। लगता है ईद तक कम लोग ही आएँगे चौपाल में। देखते हैँ अगली बार कैसा रहता है। आशा रखें 15 सितंबर का कार्यक्रम अच्छा रहे।
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