शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

२३ अप्रैल, आँसू और मुस्कान का दूसरा भाग

कार्यक्रम के अनुसार आज चौपाल में आँसू और मुस्कान का दूसरा भाग पढ़ा जाना था। बहुत दिनों बाद आज दिलीप परांजपे साहब पहुँचे और वह भी सबसे पहले, उसके बाद प्रकाश और फिर शालिनी। थोड़ी देर बाद इरफ़ान आ गए। आज के कार्यक्रम में डॉ राहिल भी उपस्थित रहे। वे कुछ पहले चले गए इसलिए फोटो में कैद नहीं हो सके।

आज की चौपाल में स्पाइस रेडियो पर प्रसारित होने वाले तीन घंटे लंबे कार्यक्रम की चर्चा रही। इसको दिलीप जी प्रस्तुत करने वाले हैं। मल्हार द्वारा प्रस्तुत किए जाने सूफी गीतों के कार्यक्रम के विषय में भी बात हुई जिसमें थियेटरवाला की ओर से कुछ नाट्य तत्त्व का समावेश होने वाला है। इसके बाद आँसू और मुस्कान का दूसरा भाग पूरा किया गया। शिशिर और हेमंत के संवाद क्रमशः प्रकाश और दिलीप जी ने पढ़े तथा बरखा और वर्षा के शालिनी और मैंने। चित्र में बाँए से- मैं, शालिनी, दिलीप परांजपे, प्रकाश और इरफ़ान। दो नियमित सदस्य डॉ. शैलेष उपाध्याय और सबीहा मजगांवर अन्यत्र व्यस्त रहने के कारण चौपल में अनुपस्थित रहे।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

१६ अप्रैल, चौपाल स्थगित

चौपाल में इस सप्ताह आँसू और मुस्कान नाटक का दूसरा भाग पढ़ा जाना था लेकिन सदस्यों के अलग अलग कारणों से अनुपस्थित रहने के कारण ऐसा न हो सका और इस बार की चौपाल स्थगित हो गई।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

९ अप्रैल, आँसू और मुस्कान

चौपाल में इस सप्ताह पढ़ा गया वसंत कानेटकर द्वारा लिखित, पी.एल. मयेकर द्वारा नाट्य रूपांतरित तथा डा. शैलेष उपाध्याय द्वारा मराठी से हिंदी में अनूदित नाटक आँसू और मुस्कान। मौसम गर्म हो चला है। दोपहर ग्यारह बजे इतनी गर्मी थी कि हम चाहते हुए भी बाहर बिना एसी के नहीं बैठ सके। जहाँ सहज मंदिर में चौपाल लगती है वहाँ के तीनों एसी सफ़ाई और सर्विसिंग में लगे थे सो हम घर में खाने की मेज़ पर पाठ के लिए बैठे। आज उपस्थित लोगों में थे- डॉ. शैलेष उपाध्याय, सबीहा मजगाँवकर, प्रकाश सोनी, कौशिक साहा, और एक नये सदस्य नीलेश पाटिल। प्रवीण जी सफ़ाई और एसी कर्मचारियों के साथ कुछ अधिक व्यस्त थे इस कारण इस बार चित्र लेना रह गया।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

२ अप्रैल, अल्लादाद खाँ के साथ

पिछले सप्ताह शरद जोशी के नाटक एक था गधा उर्फ अल्लादाद खाँ का फिर न हो सका। कारण? कुछ सदस्य छुट्टी पर थे और बचे हुए सदस्य किसी कारण इसका पाठ न कर सके। इस बार की चौपाल का प्रारंभ मल्हाल के कार्यक्रम के विषय में बातचीत करते हुए शुरू हुआ। बात कहानियों के मंचन से शुरू होकर इमारात में लोकप्रिय नाटकों की शैली तक पहुँची। इस विषय पर भी बात हुई कि हम किस प्रकार कम लोगों के साथ नियमित थियेटर कर सकते हैं। हालांकि हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे पर बात करने से ही बात बनती है यह सोचकर बातें चलती ही रहती हैं। एक घंटे बाद नाटक का पाठ शुरू हुआ और एक घंटे में पहला अंक पूरा किया गया। पहले अंक में लगभग आधा नाटक पूरा हो जाता है। इस सप्ताह उपस्थित लोग थे बाएँ से प्रकाश सोनी, डॉ. शैलेष उपाध्याय, मैं, डॉ. लता, और सबीहा मजगाँवकर। सबीहा को कुछ जल्दी जाना था सो वे चाय से पहले निकल गयीं।

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

२२ मार्च शरद जोशी का एक था गधा

पिछले सप्ताह शरद जोशी के नाटक एक था गधा उर्फ अल्लादाद खाँ का पाठ न हो सकने के कारण कार्यक्रम सूचना के अनुसार इस सप्ताह इस नाटक के पाठ की बारी है। कुछ कारणों से कार्यक्रम का विवरण अभी नहीं मिला है। आशा है विस्तृत सूचना मंगलवार तक प्रकाशित हो सकेगी। (खेद है कि अपरिहार्य कारणों से यह चौपाल नहीं लग सकी)

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

१९ मार्च, मल्हार के साथ बातचीत में


इस सप्ताह नियत कार्यक्रम के अनुसार शरद जोशी के नाटक एक था गधा उर्फ अल्लादाद खाँ का पाठ होना था। मौसम गरम होने लगा है। सबके बैठने का प्रबंध बाहर ही था लेकिन आज ऐसा लगा कि शायद बाहर गोष्ठी करने का यह इस मौसम का अंतिम दिन है। सबसे पहले डॉ. उपाध्याय आए, उन्होंने बताया कि सबीहा आज व्यस्त हैं और प्रकाश किसी व्यस्तता के कारण देर से आने वाले हैं। थोड़ी देर में डॉ. लता पधारीं और चिकित्सा की दुनिया में होने वाली देशी विदेशी सेमीनारों पर एक रोचक वार्तालाप सुनने का अवसर मिला। थोड़ी देर में प्रकाश आ गए। क्या हम नाटक का पाठ शुरू करें? संवाद पढ़ने वाले सभी लोग तो नहीं आए थे।


शायद ऊष्मा आज न भी आए तो हमें पाठ शुरू कर देना चाहिए इतनी बात हुई ही थी कि ऊष्मा, तृप्ति और मयूरा आ गयीं। वे मल्हार नामक संगीत संस्था की सदस्या हैं, जो अक्सर संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहते हैं। संस्था के अध्यक्ष जोगीराज सिकिदार हैं। वे इस बार सूफ़ी संगीत पर आधारित एक कार्यक्रम करना चाहते हैं जिसके कुछ अंश नाट्य आधारित होंगे। अगर यह योजना कार्यान्वित हुई तो शायद थियेटरवाला इसमें नाट्य सहयोग करेंगे। थोड़ी देर में कौशिक भी पहुँच गए। सारा समय इसके विभिन्न पहलुओं पर बातचीत करते हुए गुज़रा और नाट्य पाठ नहीं हो सका। शायद नाटक हम अगली बार पढ़ेंगे। चित्र में बाएँ से तृप्ति, डा.लता, डॉ.उपाध्याय, ऊष्मा, प्रकाश, मैं और मयूरा। जिस समय फोटो ली गई उस समय तक कौशिक नहीं आए थे इसलिए वे चित्र में नहीं हैं। अलबत्ता ऊष्मा का कॉफी मग उनके साथ ही चाय से पहले हाजिर हो गया था जो मेज की शोभा बढ़ा रहा है।