रविवार, 10 मई 2009

८ मई, छुट्टी का दिन

७ मई को बड़े भाई साहब और दस्तक का प्रदर्शन था। जिस दिन कोई प्रदर्शन होता है उसके अगले दिन छुट्टी रहती है। यानि शुक्रवार चौपाल नहीं लगती। इस हिसाब से शुक्रवार ८ मई, छुट्टी का दिन था। छुट्टी के बावजूद लोग खुश नहीं थे। सबका मन उदास उदास। कारण था कि पिछले दो सालों से जिस चीज़ का कभी अनुभव नहीं हुआ उसे आज झेला था। प्रदर्शन अच्छा हुआ था। दर्शकों से बात हुई। सबने प्रशंसा के शब्द कहे लेकिन दर्शकों की उपस्थिति कम थी हॉल पूरा भरा नहीं। दुबई में एक बॉलीवुड सितारे के नाटक के कारण ज्यादातर भीड़ वहीं थी। ३०० दर्शकों को क्षमता वाले इस हॉल में १०० लोग भी नहीं आए थे। यह दिन भी एक न एक दिन देखना तो था। हम पैसे बचाने के लिए साल भर की तारीखें एक साथ बुक करते हैं और इस बीच अगर कोई बड़ा कार्यक्रम उसी दिन आ पड़ा तो उसका नुक्सान तो हमें ही उठाना पड़ेगा। बाद में तारीख बदलना संभव नहीं होता है। खैर खुशी की बात यह थी कि प्रदर्शन अच्छा रहा। अगले शुक्रवार फिर मिलना है और एक और नाटक का मंचन होना है। इस प्रकार के अनुभव सुखद तो नहीं होते पर जीवन का पाठ ज़रूर पढ़ाते हैं। शारजाह में हिंदी नाटकों का परिदृश्य नया नया ही है। इसकी कोई पृष्ठभूमि नहीं है नियमित नाटकों के मंचन से हम यहाँ दर्शकों को निर्माण करें और एक हिंदी नाटकों की एक स्वस्थ परंपरा स्थापित करें यही लक्ष्य है और इस दिशा में हमारा प्रयत्न सदा बना रहे ईश्वर से यही प्रार्थना है। इस प्रदर्शन के फ़ोटो अभी नहीं आए हैं आते ही प्रदर्शित करेंगे। प्रकाश ने सबको धन्यावाद संदेश भेजे फिलहाल वही संदेश ब्लॉग के पाठकों लिए यहाँ प्रस्तुत है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्णिमा जी
    आपके द्बारा किये जा रहे रंग्मंडलीय प्रयास बेशक वन्दनीय हैं.
    नाट्य मंचन का ये आगाज़ जल्द ही लोकप्रियता के शिखर को छुयेगा.
    बधाई.
    -विजय

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