शनिवार, 11 अप्रैल 2009

१० अप्रैल, नाटकों का पोस्टमॉर्टम

९ अप्रैल की शाम मिलिंद तिखे की शाम रही। पहला नाटक राई का पहाड़ उनका लिखा हुआ था तो दूसरा पोस्टमॉर्टम उनके द्वारा मराठी से हिन्दी में रूपांतरित। दोनों कामदी नाटक दर्शकों को गुदगुदाने में सफल रहे। पहले नाटक में जहाँ टी वी चैनलों द्वारा समाचारों को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करने पर व्यंग्य था वहीं दूसरे एकांकी में रंगमंच के पीछे होने वाली भूलों को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया गया था। मिलिंद तिखे पिछले कई दशकों से इमारात में हैं और लगभग नियमित रूप से चुपचाप लिखते रहे हैं।


राई का पहाड़ का निर्देशन महबूब हसन रिज़वी ने किया था और पोस्टमॉर्टम का श्रीकांत रेले ने। यहाँ प्रस्तुत हैं राई का पहाड़ के कुछ चित्र- ज़ुल्फ़ी शेख के कैमरे से। १० भूमिकाओं वाले इस नाटक में मंच पर टीवी समाचार वाचक की भूमिका मीर इमरान हुसैन और सरयू गजधर ने, निर्देशक की ऐज़ाज चौधरी ने, लेखक की एहाज़खान ने, हवलदार की ज़ुल्फ़ी शेख ने, रिपोर्टर की मुफ़द्दल बूटवाला ने, ज्योतिष गुरु की सबीहा मजगावकर ने और रेनू की शांति ने निभाई थी।


आज १० अप्रैल यानी नाटकों के एक दिन बाद जमी चौपाल में हमेशा की तरह कुछ समय नाटकों की प्रस्तुति के बाद प्रस्तुति का पोस्टमॉर्टम करने में गया। इसके बाद कुछ प्रसिद्ध और कुछ समसामयिक रचनाओं का पाठ हुआ। मुंशी प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी को पढ़ा डॉ. शैलेष उपाध्याय ने। मनोहर पुरी के व्यंग्य गर्म है जूतों का बाज़ार को पढ़ा जुल्फ़ी शेख ने और कृष्ण कल्पित की एक शराबी की सूक्तियाँ को पढ़ा प्रकाश सोनी ने।


एक दिन पहले सब देर रात घर गए थे। लगा था कि इस शुक्रवार उपस्थिति कम रहेगी पर काफ़ी लोग आ गए। सबीहा, मेनका, डॉ.उपाध्याय, प्रकाश सोनी, कौशिक साहा, जुल्फी शेख, मिलिन्द तिखे, मूफ़ी, रिज़वी साहब और अश्विन के साथ शुक्रवार की सुबह मज़ेदार रही। चित्र में सब लोग नहीं दिख रहे हैं पर अब तो ब्लॉग पढ़ने वाले सबको नामों से पहचानते ही हैं। अरे हाँ... नाटक के चित्र अभी तक नहीं आए। जैसे ही आते हैं यहाँ लगाने की कोशिश करेंगे। (गोष्ठी का चित्र हट चुका है और उसकी जगह नाटक के चित्र लग गए हैं। शायद कुछ और बेहतर चित्र आने वाले हैं। तब तक ये सबका मनोरंजन करेंगे।)

1 टिप्पणी:

  1. आपका नाटको के सम्बन्ध में फोटो सहित पोस्ट मार्टम अच्छा रहा . बधाई.

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