
आज विशेष अवसर था चौपाल की दूसरी वर्षगाँठ का। इस उपलक्ष्य में फ़िल्म शो, आशु-अभिनय और रात्रिभोज की तैयारियाँ की गई थीं। साल भर बाद इतने लोग एक साथ मिलते हैं। लगभग ३० लोग इस बार एकत्रित हुए। साहित्य और रंगकर्मियों के परिवार भी साथ थे। सबके मन में खुशी और उत्साह था।
विशेष आकर्षण यह था कि नाटकों में जिसने जो रोल निभाए थे वे उसी परिधान और अभिनय में रहने वाले थे। शाम ७ बजे तक लॉन सज चुका था। छोटे बल्ब टिमटिमाने लगे थे और संगीत शुरू हो गया था। अंधेरा होते ही मेहमान भी आने लगे। सक्खूबाई, हवलदार, मैट्रीशिया, कोर्टमार्शल के अभिनेता सब अपने अपने रंग में... जिन लोगों ने पूरी पार्टी में अपनी रौनक बनाए रखी उसमें मूफ़ी का हवलदार और मेनका की सुक्खूबाई सबका दिल जीत कर ले गए। कोल्ड ड्रिंक और कवाब मज़ेदार रहे। खाना स्वादिष्ट था।
खाने से पहले फिल्मों के सत्र में सुनील की कुछ नायाब विज्ञापन, कुछ पुरस्कारप्राप्त छोटी फ़िल्में और कुछ अन्य छोटी रोचक फ़िल्मों को देखने का कार्यक्रम था। एक घंटे लंबे इस कार्यक्रम में सुनील के संग्रह से निकाली गई ये फ़िल्में काफ़ी पसंद की गईं।
